डेस्क । मुंबई
मनसे के प्रमुख Raj Thackeray ने वरुणराज भिडे स्मृति पुरस्कार कार्यक्रम में संक्षिप्त लेकिन असरदार संबोधन दिया। उन्होंने कहा कि विस्तृत विचार वे अगले दिन अपने व्याख्यान में रखेंगे, लेकिन मौजूदा हालात पर कुछ जरूरी बातें रखना आवश्यक है।
पत्रकारिता पर चिंता : “आवाज़ उठाने का असर नहीं”
राज ठाकरे ने कहा कि पत्रकारिता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन उसकी प्रभावशीलता कम होती दिख रही है। उनके मुताबिक, आज स्थिति ऐसी बन गई है कि पत्रकार चाहे कितना भी लिखें या बोलें, सरकार पर उसका अपेक्षित असर नहीं पड़ता। यह लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
राजनीतिक दबाव और पत्रकारों की मजबूरी
उन्होंने बताया कि कई पत्रकार अब सीधे राजनीतिक नेताओं के साथ काम कर रहे हैं। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि सत्ता पक्ष मीडिया को प्रभावित या नियंत्रित कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि कई युवा पत्रकार काम करना चाहते हैं, लेकिन राजनीतिक दबाव के कारण वे खुलकर अपनी बात नहीं रख पाते।
एकजुटता की जरूरत
राज ठाकरे ने पत्रकारों से एकजुट होने की अपील की। उन्होंने कहा कि अगर मीडिया संगठित होकर काम करे, तो किसी भी दबाव का सामना किया जा सकता है। उन्होंने आपसी प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या छोड़कर महत्वपूर्ण मुद्दों पर साथ आने की आवश्यकता बताई।
शहरी विकास और अव्यवस्था पर सवाल
उन्होंने महाराष्ट्र के शहरों, खासकर मुंबई और पुणे की अव्यवस्थित विकास स्थिति पर चिंता जताई। उनके अनुसार, बिना योजना के बढ़ते निर्माण और अनधिकृत बस्तियों के कारण शहरों का संतुलन बिगड़ रहा है, और इसके लिए जिम्मेदारी तय नहीं हो रही।
मराठी स्कूल और जमीन का मुद्दा
राज ठाकरे ने कहा कि मराठी स्कूलों के बंद होने के पीछे केवल शिक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि जमीन का बड़ा खेल है। उनके मुताबिक, कीमती जमीनों पर नजर होने के कारण स्कूलों को हटाया जा रहा है, जो गंभीर विषय है।
सोशल मीडिया और असली मुद्दों से भटकाव
उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया बुरा नहीं है, लेकिन लोगों का ध्यान असली मुद्दों से हटाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। मनोरंजन और ट्रेंड्स में उलझाकर जनता को मूल समस्याओं से दूर किया जा रहा है।
मराठी पहचान और जागरूकता का सवाल
राज ठाकरे ने मराठी भाषा और पहचान को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अगर लोगों में अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति जागरूकता नहीं होगी, तो भविष्य में इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
“सवाल उठाना जरूरी, तभी बदलाव संभव”
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में बदलाव तभी संभव है, जब पत्रकार और जनता दोनों मिलकर सवाल उठाएं। अगर दबाव के आगे झुकना जारी रहा, तो व्यवस्था में सुधार मुश्किल हो जाएगा।
