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PUNE : एक टिकट, दो नामांकन

Desk | Pune

विधान परिषद चुनाव के बीच पुणे में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के भीतर अभूतपूर्व राजनीतिक ड्रामा देखने को मिला। एक ही सीट के लिए पार्टी के दो नेताओं—पूर्व विधायक एवं पुणे शहर अध्यक्ष सुनील टिंगरे और हाल ही में पार्टी में शामिल हुए विक्रम काकड़े—ने नामांकन दाखिल कर दिया। इससे पार्टी के अंदरूनी मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। चर्चा यह भी है कि दोनों नेताओं के पास एबी फॉर्म मौजूद है। ऐसे में पार्टी का अधिकृत उम्मीदवार कौन होगा, इस पर पूरे महाराष्ट्र की नजरें टिकी हुई हैं। महायुति में यह सीट राष्ट्रवादी कांग्रेस के खाते में आने के बाद उम्मीदवार चयन को लेकर पार्टी के भीतर जोरदार खींचतान शुरू हो गई। पुणे स्थित पार्टी कार्यालय में सुनील टिंगरे और विक्रम काकड़े आमने-सामने बैठकर नामांकन पत्र भरते दिखाई दिए। इसके बाद दोनों नेताओं ने अलग-अलग समय पर जिला कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर अपना-अपना नामांकन दाखिल किया।

हालांकि पार्टी प्रवक्ताओं ने स्पष्ट किया है कि विक्रम काकड़े ही अधिकृत उम्मीदवार हैं, लेकिन टिंगरे समर्थकों ने “सुनील अण्णा आगे बढ़ो, हम तुम्हारे साथ हैं” के नारे लगाकर शक्ति प्रदर्शन किया। इससे उम्मीदवार को लेकर विवाद और गहरा गया है। सुनील टिंगरे का लंबा राजनीतिक सफर सुनील टिंगरे को राष्ट्रवादी कांग्रेस के पुराने और निष्ठावान नेताओं में गिना जाता है। नगरसेवक से विधायक तक का उनका राजनीतिक सफर रहा है। वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा के तत्कालीन विधायक जगदीश मुळीक को हराकर विधानसभा में प्रवेश किया था। उन्हें उपमुख्यमंत्री अजित पवार का करीबी माना जाता है। हालांकि 2024 के विधानसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन वर्तमान में वे पुणे शहर अध्यक्ष के रूप में पार्टी संगठन को मजबूत करने में जुटे हैं। विक्रम काकड़े को मिली अचानक बड़ी जिम्मेदारी विक्रम काकड़े उद्योगपति और राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी के रूप में पहचाने जाते हैं।

उन्हें पार्थ पवार का करीबी माना जाता है। खास बात यह है कि उम्मीदवारों की घोषणा से कुछ मिनट पहले ही उन्होंने राष्ट्रवादी कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की और तुरंत उन्हें विधान परिषद का टिकट दे दिया गया। इसी वजह से विरोधी उन्हें “आयातित उम्मीदवार” करार दे रहे हैं। कार्यकर्ताओं में नाराजगी उम्मीदवारी के फैसले से पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं में नाराजगी का माहौल है। कई कार्यकर्ताओं का आरोप है कि वर्षों से पार्टी के लिए काम करने वाले नेताओं की अनदेखी कर नए शामिल हुए व्यक्ति को टिकट दिया गया। पार्टी कार्यालय में कुछ कार्यकर्ताओं ने “निष्ठा हारी, पैसा जीता” जैसे नारे भी लगाए, जिससे माहौल काफी गर्म हो गया। प्रतिष्ठा की लड़ाई बनी चुनाव यह चुनाव केवल विधान परिषद की एक सीट जीतने तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे राष्ट्रवादी कांग्रेस की प्रतिष्ठा से भी जोड़कर देखा जा रहा है। महायुति के पास पर्याप्त संख्या बल होने के कारण जीत का गणित कठिन नहीं है, लेकिन पुणे में पार्टी संगठन, कार्यकर्ताओं के विश्वास और भविष्य की राजनीतिक रणनीति के लिहाज से यह चुनाव बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब किसकी होगी माघार? फिलहाल राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अंतिम रूप से विक्रम काकड़े का नामांकन ही बरकरार रह सकता है। हालांकि सुनील टिंगरे का नामांकन केवल डमी उम्मीदवार के रूप में भरा गया है या नहीं, इस पर पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक स्पष्टता नहीं दी गई है। ऐसे में आखिरी समय में कौन पीछे हटेगा और राष्ट्रवादी कांग्रेस का अधिकृत उम्मीदवार कौन होगा, इसे लेकर उत्सुकता चरम पर पहुंच गई है। पुणे विधान परिषद चुनाव के बहाने राष्ट्रवादी कांग्रेस के भीतर का अंतर्कलह खुलकर सामने आ गया है। अब आने वाले दिनों में इस राजनीतिक नाटक का पटाक्षेप कैसे होता है, इस पर पूरे महाराष्ट्र की नजरें टिकी हुई हैं।